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विश्व मूलनिवासी दिवस: ‘आदिवासी’ से आगे मूलनिवासी पहचान की ऐतिहासिक पड़ताल

विश्व मूलनिवासी दिवस: ‘आदिवासी’ से आगे मूलनिवासी पहचान की ऐतिहासिक पड़ताल

लेखक: नन्द किशोर पटेल

संपादक, अपना विचार साप्ताहिक समाचार पत्र

9 अगस्त—विश्व मूलनिवासी दिवस केवल किसी एक समुदाय के उत्सव का दिन नहीं, बल्कि दुनिया भर में उन समुदायों की पहचान, संस्कृति, परंपरा, भाषा, अधिकार और विरासत को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने उपनिवेशवाद और सामाजिक-सांस्कृतिक विस्थापन के कारण अपनी अनेक परंपराओं को खोया अथवा उन्हें संरक्षित करने के लिए संघर्ष किया।

भारत में 9 अगस्त को प्रायः ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के नाम से मनाया जाता है। यह एक प्रचलित सामाजिक संबोधन है, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में ‘मूलनिवासी’ की अवधारणा को केवल वनांचल में रहने वाले कुछ समुदायों तक सीमित कर देना उचित है?

भारत के संदर्भ में यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि संविधान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी संवैधानिक-सामाजिक श्रेणियां मौजूद हैं। इन समुदायों के इतिहास, सामाजिक संरचना और भारत की मूल सामाजिक परंपराओं के संदर्भ में ‘मूलनिवासी’ शब्द को लेकर लंबे समय से विमर्श होता रहा है।

‘आदिवासी’ शब्द से पहले ‘मूलनिवासी’ का प्रयोग

आज वनांचल और जनजातीय समुदायों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इतिहास के अनेक दस्तावेजों और सामाजिक आंदोलनों में ‘मूलनिवासी’ शब्द के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं।

मध्य प्रांत और बरार के दौर में गोंड समाज द्वारा 1916 में ‘गोंडवाना महासभा’ की स्थापना किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस महासभा का पहला अधिवेशन 1931 में गोंदिया तथा इसके बाद 1935 में सिवनी में आयोजित हुआ। इन अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों में ‘मूलनिवासी गोंड सगा समाज’ जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है।

इसी क्रम में 1945 में गोंडवाना महासभा का छठा अधिवेशन नैनपुर में आयोजित हुआ। इसमें तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और जनजातीय समुदायों के संबंध में पूर्व में की गई सिफारिशों का उल्लेख करते हुए ‘मूलनिवासी’ शब्द का प्रयोग किया गया।

इसके अतिरिक्त 1931 में चांदा गढ़ में आयोजित ‘गोंडी पुनेम सम्मेलन’ में भी ‘मूलनिवासी गोंडी धर्म समाज सेवा समिति’ के गठन का प्रस्ताव सामने आने का उल्लेख मिलता है।

इन उदाहरणों से यह संकेत मिलता है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में गोंड समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श में ‘मूलनिवासी’ शब्द का प्रयोग किसी नए राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि पहचान और सामाजिक अस्तित्व को व्यक्त करने वाले शब्द के रूप में किया जाता था।

ज्योतिराव फुले और ‘शूद्र-अतिशूद्र’ का विमर्श

मूलनिवासी अवधारणा की चर्चा केवल जनजातीय समाज तक सीमित नहीं रही। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत महात्मा ज्योतिराव फुले ने 1873 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति ‘गुलामगिरी’ में भारतीय समाज की सामाजिक असमानता और ब्राह्मणवादी व्यवस्था की आलोचना करते हुए शूद्र और अतिशूद्र समाज की ऐतिहासिक स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।

फुले के विचारों में शूद्र-अतिशूद्रों को भारत की मूल सामाजिक आबादी से जोड़ने की स्पष्ट वैचारिक धारा दिखाई देती है। उनके लेखन ने यह सवाल खड़ा किया कि भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संसाधनों पर वास्तविक अधिकार किसका होना चाहिए और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को उनका न्यायसंगत स्थान क्यों नहीं मिला?

इस दृष्टि से ‘मूलनिवासी’ शब्द को केवल भौगोलिक निवास से जोड़ना पर्याप्त नहीं है। यह शब्द इतिहास, सामाजिक अधिकार, सांस्कृतिक विरासत और प्रतिनिधित्व से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा रहा है।

विश्व मूलनिवासी दिवस को व्यापक सामाजिक विमर्श बनाना होगा

9 अगस्त का दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि भारत में मूलनिवासी विमर्श को किसी एक जाति, जनजाति या समुदाय तक सीमित न किया जाए। भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत विविध है और यहां अनेक समुदायों ने सदियों से अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अस्तित्व के लिए संघर्ष किया है।

इसलिए विश्व मूलनिवासी दिवस को केवल उत्सव के रूप में मनाने के बजाय इसे सामाजिक न्याय, समान अवसर, सांस्कृतिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार, संसाधनों में भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों से जोड़ना जरूरी है।

साथ ही, इस विमर्श में ऐतिहासिक तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। ‘मूलनिवासी’ एक सामाजिक-ऐतिहासिक और वैचारिक अवधारणा है, जबकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग संविधान तथा कानूनों में निर्धारित प्रशासनिक-सामाजिक श्रेणियां हैं। दोनों को एक-दूसरे का पर्याय मानने के बजाय उनके संदर्भ और इतिहास को समझना अधिक उचित होगा।

पहचान का प्रश्न केवल नाम का प्रश्न नहीं

किसी समुदाय को ‘आदिवासी’, ‘जनजाति’, ‘मूलनिवासी’ या किसी अन्य नाम से संबोधित करना केवल शब्दों का चुनाव नहीं है। इसके पीछे इतिहास, अस्मिता और अधिकारों का प्रश्न जुड़ा होता है।

इसलिए 9 अगस्त को हमें केवल शुभकामनाएं देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन हमें यह विचार करने के लिए प्रेरित करे कि जिन समुदायों ने इस देश की सभ्यता, कृषि, श्रम, जंगल, जल, जमीन और संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया, उन्हें समान सम्मान और निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी कैसे मिले।

विश्व मूलनिवासी दिवस का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब यह दिवस सामाजिक विभाजन का माध्यम बनने के बजाय इतिहास की पुनर्पाठ, सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा और संवैधानिक समानता के संकल्प का दिन बने।

मूलनिवासी विमर्श किसी एक समुदाय की आवाज नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, सम्मान और अधिकारों पर व्यापक संवाद का अवसर है।

जय भारत। जय संविधान।

Author

  • नंदकिशोर पटेल
    प्रधान संपादक एवं प्रकाशक
    भारत सरकार के नियमानुसार पंजीकृत समाचार पत्र के संपादक के रूप में निष्पक्ष, निर्भीक एवं जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित। सत्य, पारदर्शिता और जनविश्वास हमारी पहचान है।

    सत्य • निष्पक्षता • जनहित

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नंदकिशोर पटेल प्रधान संपादक एवं प्रकाशक भारत सरकार के नियमानुसार पंजीकृत समाचार पत्र के संपादक के रूप में निष्पक्ष, निर्भीक एवं जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित। सत्य, पारदर्शिता और जनविश्वास हमारी पहचान है।
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