महंगाई के दौर में दिव्यांग पेंशन पर पुनर्विचार जरूरी : क्या 600 रुपये प्रतिमाह सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त हैं?

*महंगाई के दौर में दिव्यांग पेंशन पर पुनर्विचार जरूरी : क्या 600 रुपये प्रतिमाह सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त हैं?*
लेखिका कु प्रियंका सामाजिक कार्यकर्ता _चिंतक।
किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य की संवेदनशीलता का आकलन इस बात से किया जाता है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद नागरिकों के जीवन को कितना सुरक्षित और सम्मानजनक बना पाता है। दिव्यांगजन समाज का ऐसा ही एक वर्ग हैं, जिनके सामने जीवन की चुनौतियाँ सामान्य नागरिकों की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन होती हैं। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा पेंशन उनके लिए महज आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जीवन का सहारा होती है।मध्यप्रदेश में वर्तमान में दिव्यांगजनों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में मात्र 600 रूपये प्रतिमाह प्रदान किए जाते हैं। यह राशि उस समय निर्धारित की गई थी जब जीवन-यापन की लागत अपेक्षाकृत कम थी, किंतु आज बढ़ती महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च, दवाइयों की कीमतों, सहायक उपकरणों तथा परिवहन व्यय को देखते हुए 600 रूपये प्रतिमाह की राशि वास्तविक आवश्यकताओं के सामने अत्यंत नगण्य प्रतीत होती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति आज 20 रूपये प्रतिदिन से भी कम राशि में सम्मानजनक जीवन जी सकता है? यदि नहीं, तो फिर लाखों दिव्यांगजनों से ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है? देश के विभिन्न राज्यों ने समय के साथ इस वास्तविकता को स्वीकार किया है और अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि की है। हरियाणा सरकार ने दिव्यांग पेंशन को बढ़ाकर 3,200 रूपये प्रतिमाह कर दिया है। वहीं तेलंगाना में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अंतर्गत हजारों रुपये प्रतिमाह की सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में भी दिव्यांगजनों को विभिन्न श्रेणियों के अनुसार 1150 से 1700 रूपये प्रतिमाह तक सहायता प्रदान की जा रही है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश में 600 रूपये प्रतिमाह की राशि न केवल अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम है, बल्कि यह दिव्यांगजनों की वास्तविक आवश्यकताओं और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के अनुरूप भी नहीं है।
दिव्यांगजन केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और संरचनात्मक चुनौतियों से भी जूझते हैं। उन्हें नियमित चिकित्सा, विशेष उपकरण, पुनर्वास सेवाओं और कई मामलों में दूसरे व्यक्ति की सहायता की आवश्यकता होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांगजनों की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ एवं रोजगार के अवसर सीमित हैं। भारतीय संविधान सामाजिक न्याय, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 भी राज्य सरकारों पर यह नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व डालता है कि वे दिव्यांगजनों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराएँ। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ केवल औपचारिकता न बनकर वास्तविक सहायता का माध्यम बनें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मध्यप्रदेश सरकार दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 600 रूपये से बढ़ाकर न्यूनतम 2000 रूपये प्रतिमाह तथा चरणबद्ध रूप से 2500 रूपये प्रतिमाह करने पर गंभीरता से विचार करे। यह केवल आर्थिक सहायता में वृद्धि नहीं होगी, बल्कि लाखों दिव्यांगजनों के सम्मान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। दिव्यांगजन किसी विशेष अनुग्रह के नहीं, बल्कि समान अधिकार और समान सम्मान के अधिकारी हैं। यदि अन्य राज्य अपने दिव्यांग नागरिकों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं, तो मध्यप्रदेश सरकार को भी इस दिशा में एक संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय लेकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। समय की मांग है कि दिव्यांगजनों की आवाज़ को सुना जाए और उनकी पेंशन को वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए। क्योंकि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसके सबसे कमजोर नागरिक के चेहरे पर दिखाई देने वाले सम्मान और आत्मविश्वास से मापी जाती है। दिव्यांगजनों को सहानुभूति नहीं, सम्मानजनक जीवन चाहिए और सम्मानजनक जीवन मात्र 600 रूपये प्रतिमाह में संभव नहीं है।
आज आवश्यकता केवल नीतियों और घोषणाओं की नहीं, बल्कि ऐसे निर्णयों की भी है जो दिव्यांगजनों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकें। एक संवेदनशील राज्य वही है, जो अपने सबसे कमजोर नागरिक के भविष्य को सुरक्षित करने का साहस रखता हो। दिव्यांग वर्ग बहुत आशा भरी निगाहों से मध्यप्रदेश शासन की ओर देख रहा है! उम्मीद है कि मध्यप्रदेश सरकार इस दिशा में एक सकारात्मक और मानवीय पहल करते हुए दिव्यांगजनों को सम्मानजनक जीवन जीने का सशक्त आधार प्रदान करेगा। दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा पर किया गया प्रत्येक निवेश केवल एक कल्याणकारी व्यय ही नहीं बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता का प्रतीक होता है।



