पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर : सामाजिक बराबरी और आत्मसम्मान की आवाज

पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर : सामाजिक बराबरी और आत्मसम्मान की आवाज
### पिछड़ों, वंचितों और शोषितों के महान समाज सुधारक की जयंती पर विशेष लेख
**अपना विचार समाचार पत्र | सिंगरौली, मध्यप्रदेश**
**17 सितंबर | पेरियार जयंती पर विशेष**
सामाजिक न्याय के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले महान विचारक को कोटि-कोटि नमन
भारतीय समाज सुधार आंदोलन के इतिहास में पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर का नाम एक ऐसे महान समाज सुधारक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास और मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध जीवनभर संघर्ष किया। उन्होंने समाज के पिछड़े, वंचित और शोषित वर्गों को सम्मान, शिक्षा, अधिकार और आत्मसम्मान के साथ जीने का संदेश दिया। उनकी जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
## जन्म से संघर्ष तक का सफर
पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर का जन्म 17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में हुआ था। उनका जीवन ऐसे समय में आगे बढ़ा, जब भारतीय समाज में जातिगत ऊंच-नीच, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव गहराई से मौजूद था।
पेरियार ने अपने अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों से यह समझा कि जब तक समाज में जन्म के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव समाप्त नहीं होगा, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता और बराबरी का सपना अधूरा रहेगा। उन्होंने रूढ़ियों और असमानता के विरुद्ध सवाल उठाने को सामाजिक परिवर्तन का आवश्यक माध्यम माना।
## आत्मसम्मान आंदोलन : बराबरी की बुनियाद
पेरियार ने 1925 में **आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement)** की शुरुआत की। इस आंदोलन का उद्देश्य लोगों में आत्मसम्मान, तर्कशीलता और सामाजिक समानता की भावना विकसित करना था।
उनका विचार था कि किसी भी मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके जन्म, जाति या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके मानव होने से निर्धारित होनी चाहिए। उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता, विधवा पुनर्विवाह, अंतरजातीय विवाह और शिक्षा के अधिकार जैसे मुद्दों को सामाजिक सुधार के केंद्र में रखा।
आत्मसम्मान आंदोलन ने दक्षिण भारत में सामाजिक और वैचारिक बदलाव की एक महत्वपूर्ण धारा को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन को प्रभावित किया।
## जाति व्यवस्था और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज
पेरियार ने जाति व्यवस्था को सामाजिक असमानता का प्रमुख आधार माना। उन्होंने जन्म आधारित ऊंच-नीच, छुआछूत और ब्राह्मणवादी वर्चस्व की आलोचना की तथा तर्क, वैज्ञानिक सोच और मानव समानता पर जोर दिया।
वे धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं की आलोचना करने के लिए भी जाने जाते हैं, विशेषकर तब, जब उनका उपयोग सामाजिक भेदभाव या मनुष्य की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए किया जाता था।
उनका संदेश था कि किसी भी परंपरा या विश्वास को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वह पुराना है। मनुष्य को प्रश्न करने, विचार करने और अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
## द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख प्रेरणास्रोत
पेरियार को द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख वैचारिक संस्थापकों में माना जाता है। उन्होंने सामाजिक न्याय, गैर-ब्राह्मण अधिकारों, आत्मसम्मान और भाषाई-सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों को व्यापक जनचर्चा का विषय बनाया।
1944 में उन्होंने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़र कड़गम (Dravidar Kazhagam) किया। यह संगठन सामाजिक समानता और द्रविड़ विचारधारा के प्रसार का प्रमुख माध्यम बना।
द्रविड़ आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। आरक्षण, सामाजिक न्याय, शिक्षा और पिछड़े वर्गों के अधिकारों से जुड़े विमर्श में पेरियार के विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
## महिलाओं की स्वतंत्रता और शिक्षा पर जोर
पेरियार का मानना था कि समाज की प्रगति महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों के बिना संभव नहीं है। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, विवाह में स्वतंत्रता और पितृसत्तात्मक रूढ़ियों के विरोध का समर्थन किया।
उन्होंने विवाह को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि समान अधिकारों और आपसी सहमति पर आधारित सामाजिक संबंध के रूप में देखने पर जोर दिया। आत्मसम्मान विवाह इसी विचारधारा की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति था।
उनके विचारों ने महिलाओं और वंचित समुदायों के अधिकारों पर होने वाली बहस को नई दिशा दी।
## आज के समाज के लिए पेरियार की प्रासंगिकता
आज भी जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास, लैंगिक भेदभाव और शिक्षा में असमान अवसर जैसी चुनौतियां समाज के सामने मौजूद हैं। ऐसे समय में पेरियार का तर्क, आत्मसम्मान और समानता पर आधारित चिंतन महत्वपूर्ण बना हुआ है।
उनकी विचारधारा हमें यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि क्या समाज में प्रत्येक व्यक्ति को समान सम्मान, अवसर और अधिकार प्राप्त हैं? क्या शिक्षा और रोजगार के अवसर सभी वर्गों तक पहुंच रहे हैं? क्या महिलाओं और कमजोर वर्गों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिल रही है?
इन सवालों पर गंभीर विचार करना ही किसी भी समाज सुधारक की विरासत को समझने का सार्थक तरीका है।
## विचारों से परिवर्तन की दिशा
पेरियार का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि लोगों की सोच में बदलाव से भी आता है। उन्होंने शिक्षा, संगठन, तर्कशीलता और आत्मसम्मान को परिवर्तन के महत्वपूर्ण साधन माना।
उनकी आलोचनाओं और विचारों पर समाज में अलग-अलग मत रहे हैं। फिर भी सामाजिक बराबरी, जाति-विरोध और मानव सम्मान के प्रश्नों पर उनकी भूमिका भारतीय सामाजिक इतिहास में महत्वपूर्ण बनी हुई है।
पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर की जयंती केवल एक महान समाज सुधारक को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, बराबरी और मानव सम्मान के मूल्यों पर विचार करने का दिन है।
उनकी विरासत हमें सिखाती है कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को बिना जाति, धर्म, लिंग और जन्म के भेदभाव के सम्मान और समान अवसर प्राप्त हों।
**पेरियार के विचारों को समझना, सवाल करना और सामाजिक बराबरी की दिशा में काम करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।**
**पेरियार ई. वी. रामासामी नायकर जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।**
**जय भीम • जय मूलनिवासी • जय संविधान • जय भारत**



