Blogदीपेंद्र की कलमदेश प्रदेशबड़ी न्यूज़मुद्दे की बात नंदकिशोर के साथसिंगरौली

कोलेजियम पर उठे सवाल: पारदर्शिता से भागेगी न्यायपालिका या भरोसा मजबूत करेगी?

अपना विचार समाचार।

“न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।” यही सिद्धांत लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय के ही न्यायाधीश न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाने लगें, तो यह केवल एक प्रशासनिक बहस नहीं रह जाती, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने कोलेजियम द्वारा हाल की नियुक्ति और पदोन्नति संबंधी सिफारिशों में कारण सार्वजनिक न किए जाने पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि किसी न्यायाधीश को उच्च पद पर भेजने के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया जाएगा, तो यह पारदर्शिता के सिद्धांत को कमजोर करेगा। इससे योग्य और उत्कृष्ट न्यायाधीशों की अनदेखी हो सकती है, जबकि ऐसे लोगों के आगे बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है, जिनकी सार्वजनिक टिप्पणियां संविधान के मूल्यों के अनुरूप नहीं रही हों।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब न्यायाधीशों की नियुक्ति व्यवस्था पहले से ही लंबे समय से बहस के केंद्र में है। एक ओर न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोलेजियम प्रणाली को आवश्यक मानती है, तो दूसरी ओर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग लगातार उठती रही है।

जस्टिस भुइयां ने किसी का नाम लिए बिना उस विवादास्पद टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें एक उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश ने एक समुदाय के लोगों के बारे में “चींटियां” जैसे शब्दों का प्रयोग किया था। उनका संकेत स्पष्ट था—यदि नियुक्ति प्रक्रिया में ठोस मूल्यांकन और कारणों की पारदर्शिता नहीं होगी, तो भविष्य में ऐसे विवादों की संभावना बनी रहेगी।

दूसरी ओर, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि कोलेजियम किसी भी नाम पर विचार करते समय न्यायिक कार्य, अनुभव, वरिष्ठता और पेशेवर जीवन सहित अनेक पहलुओं का मूल्यांकन करता है। वहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संबंधी सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और जस्टिस दीपांकर दत्ता के बीच हुई चर्चा ने भी यह संकेत दिया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर प्रश्न केवल न्यायपालिका के भीतर ही नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच भी मौजूद हैं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या कारण बताना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा, या फिर जनता का विश्वास और मजबूत करेगा? यदि किसी नियुक्ति के पीछे वस्तुनिष्ठ और संस्थागत आधार हैं, तो उन्हें संक्षेप में सार्वजनिक करने से प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। वहीं, यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसी पारदर्शिता न्यायाधीशों की व्यक्तिगत गरिमा या गोपनीय मूल्यांकन प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से प्रभावित न करे।

लोकतंत्र में हर संस्था की ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकारों से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से भी आती है। न्यायपालिका भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए कोलेजियम व्यवस्था पर उठ रहे प्रश्नों को टकराव के रूप में नहीं, बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।

अपना विचार: न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता—दोनों लोकतंत्र के लिए समान रूप से आवश्यक हैं। यदि नियुक्तियों के पीछे तर्कसंगत कारणों का सीमित लेकिन स्पष्ट प्रकटीकरण संभव हो, तो इससे योग्य न्यायाधीशों का सम्मान बढ़ेगा, विवाद कम होंगे और न्यायपालिका में जनता का भरोसा और मजबूत होगा।

Author

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button