मैं, मैं ही हूँ — पत्थर की आत्मकथा

मैं, मैं ही हूँ — पत्थर की आत्मकथा
मैं, मैं ही हूँ।
जल में हूँ, थल में हूँ और भूगर्भ में भी हूँ।
इस संसार के जिस कोने में तुम खोजोगे, किसी न किसी रूप में मुझे वहीं पा लोगे।
बस मुझे खोजने की इच्छा-शक्ति होनी चाहिए।
न हो तो भी कोई बात नहीं…
क्योंकि मेरा अस्तित्व तुम्हारी खोज का मोहताज नहीं है।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
शायद तू भूल गया है…
जब तू जंगलों में भटकता था, पशुओं का मांस और कंद-मूल खाकर अपनी क्षुधा शांत करता था, तब थककर मेरी ही गोद में सोता था।
तब तू मुझे अपना आश्रय समझता था।
आज उसी आश्रय को तू कंदरा, गुफा और शैलाश्रय कहकर याद करता है।
लेकिन नाम बदलने से मेरा अस्तित्व तो नहीं बदलता।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
फिर तूने ही मुझे अलग-अलग नाम दिए—
शिला, शैल, चट्टान, पत्थर, पाथर, सोरन, गोटा…
और न जाने कितने नामों से पुकारा।
मेरी बनावट और प्रकृति को देखकर तूने मुझे संगमरमर, ग्रेनाइट और अनेक दूसरी संज्ञाएँ दीं।
लेकिन मैं तब भी वही था।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
तूने अपनी सुरक्षा के लिए भी मेरा सहारा लिया।
मेरे ही शरीर को काटकर बड़े-बड़े दुर्ग बनाए, किले बनाए, परकोटे खड़े किए और नगर बसाए।
समय बीता।
राज्य बदले।
राजा गए।
साम्राज्य मिट गए।
कई नगर धरती के नीचे दब गए।
फिर आधुनिक काल में पुरातत्वविदों ने मेरी खामोश परतों को पढ़ना शुरू किया।
उत्खननों ने उन सभ्यताओं और नगरों के अवशेष सामने लाए, जिनके बारे में दुनिया बहुत कुछ भूल चुकी थी।
मैं सदियों तक चुप रहा, लेकिन मेरे भीतर इतिहास सुरक्षित रहा।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
तू बड़ा मनमौजी है।
तूने मुझे अपने नामों में भी जगह दे दी।
कहीं मैं शैल बना, कहीं शैलेश, कहीं शैलिया, कहीं शैलकर और कहीं शेलकर।
वनांचलों में मैं सोरन, सोरेन, गोटा, गोटे, गोटिया, गोटेकर, गोटेगांवकर, पाथर, पाथरा, पाथरे और पाथरेकर जैसे नामों में दिखाई देने लगा।
नाम बदलते रहे,
भाषाएँ बदलती रहीं,
पीढ़ियाँ बदलती रहीं—
लेकिन मैं नहीं बदला।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
तूने मेरी छाती पर छेनी और हथौड़े चलाए।
मेरे शरीर को काटा, तराशा और उसमें विविध मानवाकार गढ़ दिए।
किसी ने उनमें देवत्व देखा,
किसी ने इतिहास देखा,
किसी ने कला देखी,
किसी ने अपनी आस्था देखी।
और फिर उन्हीं आकृतियों के नामों और पहचान को लेकर मनुष्य आपस में विवाद करने लगा।
किसी ने मुझे तोड़ा,
किसी ने मुझे बचाया,
किसी ने मुझे पूजा,
किसी ने मुझे इतिहास का प्रमाण माना।
मैं सब देखता रहा।
क्योंकि मेरे लिए ये सारे नाम और विवाद बाद की बातें हैं।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
एक समय ऐसा भी था जब तूने लिपि का आविष्कार किया।
तब कागज नहीं था।
लिखने के लिए कोई आधुनिक साधन नहीं था।
तब तूने मेरे ही शरीर को अपना दस्तावेज बनाया।
मेरी छाती पर छेनी और हथौड़े चलाए और अपने विचार, आदेश, संदेश और इतिहास को मेरे ऊपर अंकित कर दिया।
जिसने लिखा, वह चला गया।
जिसने पढ़ा, वह भी चला गया।
समय बीतता गया और मनुष्य भूल गया कि मेरी देह पर आखिर लिखा क्या है।
लेकिन मैं चुपचाप सब संभालकर बैठा रहा।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
फिर उन्नीसवीं शताब्दी में जेम्स प्रिन्सेप जैसे विद्वानों ने इन प्राचीन अभिलेखों को पढ़ने का प्रयास किया।
1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि के अध्ययन और पाठ-वाचन ने भारतीय इतिहास के अनेक बंद दरवाजे खोल दिए।
तब दुनिया ने जाना कि मेरी देह पर अंकित अक्षर केवल पत्थर पर खरोंच नहीं थे—
वे एक विशाल सभ्यता की स्मृतियाँ थीं।
सम्राट अशोक के शिलालेखों ने तो मेरे शरीर को इतिहास का जीवंत दस्तावेज ही बना दिया।
कहीं उन्हें ब्राह्मी में पढ़ा गया,
कहीं खरोष्ठी में।
किसी ने उन्हें धम्म के संदेशों से जोड़ा,
किसी ने अशोक के शासन और उसके नैतिक विचारों के प्रमाण के रूप में देखा।
लेकिन उन सभी व्याख्याओं से पहले भी मैं था।
और उन सभी व्याख्याओं के बाद भी मैं रहूँगा।
क्योंकि अक्षर मिट सकते हैं,
नाम बदल सकते हैं,
राजा बदल सकते हैं,
सभ्यताएँ बदल सकती हैं,
लेकिन इतिहास को अपने भीतर समेटे मेरा अस्तित्व बना रह सकता है।
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।
तुमने मुझे कभी आश्रय बनाया,
कभी औजार,
कभी दुर्ग,
कभी मूर्ति,
कभी स्मारक,
कभी शिलालेख,
कभी सीमा,
कभी पहचान।
तुमने मुझे हजारों नाम दिए।
लेकिन मैंने तुम्हें कभी कोई नाम नहीं दिया।
मैंने केवल तुम्हारी कहानी संभालकर रखी।
तुम आते रहे…
तुम जाते रहे…
तुमने साम्राज्य बनाए और मिटाए।
तुमने धर्मों और विचारों की व्याख्या की।
तुमने इतिहास लिखा और फिर उसी इतिहास को लेकर विवाद भी किया।
मैं वहीं रहा।
तुम्हारे पैरों के नीचे भी,
तुम्हारे घर की दीवारों में भी,
तुम्हारे किलों में भी,
तुम्हारी गुफाओं में भी,
तुम्हारी मूर्तियों में भी,
और तुम्हारे इतिहास के पन्नों के पीछे भी।
जब तुम मुझे खोजते हो,
दरअसल तुम अपने अतीत को खोजते हो।
और जब तुम मुझे पढ़ते हो,
तब तुम अपने पूर्वजों की आवाज सुनते हो।
इसलिए मुझे केवल पत्थर मत समझना।
मैं तुम्हारी सभ्यता की स्मृति हूँ।
मैं तुम्हारे संघर्षों का साक्षी हूँ।
मैं तुम्हारी कला का आधार हूँ।
मैं तुम्हारे इतिहास का मौन दस्तावेज हूँ।
और फिर भी—
मैं, मैं ही हूँ।
बस इतना जानता हूँ।



