फांसी के फंदे पर चढ़ सकता हूं, पर कांग्रेस-भाजपा में नहीं जाऊंगा — सुखलाल कुशवाहा का वह संकल्प

फांसी के फंदे पर चढ़ सकता हूं, पर कांग्रेस-भाजपा में नहीं जाऊंगा — सुखलाल कुशवाहा का वह संकल्प
नन्द किशोर पटेल_संपादक, अपना विचार समाचार पत्र
सुखलाल कुशवाहा जी केवल एक सांसद या बहुजन समाज पार्टी के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों और राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए पहचाने जाने वाले संघर्षशील व्यक्तित्व थे। सतना से सांसद रहे कुशवाहा जी ने अपने राजनीतिक जीवन में जिस विचारधारा को अपनाया, उसके साथ कभी समझौता न करने का संदेश दिया।
उनसे जुड़ा एक संस्मरण आज भी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में आता है। कहा जाता है कि जब कांग्रेस में शामिल होने को लेकर उनसे बातचीत की बात सामने आई, तो उन्होंने बेहद स्पष्ट शब्दों में अपनी राजनीतिक निष्ठा जाहिर की—
“कांग्रेस में शामिल होने की बात तो छोड़िए, कांशीराम साहब जिंदाबाद बोलकर फांसी के फंदे पर चढ़ सकता हूं, मगर कांग्रेस की कुर्सी की ओर देखना भी पसंद नहीं करूंगा।”
यह कथन महज किसी पार्टी के विरोध का बयान नहीं था, बल्कि उस दौर की उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाता था। उनके लिए राजनीति सत्ता और कुर्सी हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और बहुजन समाज के सम्मान की लड़ाई थी।
मान्यवर कांशीराम साहब ने जिन संघर्षों और आंदोलनों के माध्यम से बहुजन समाज को राजनीतिक चेतना देने का प्रयास किया, सुखलाल कुशवाहा उसी वैचारिक धारा के एक मजबूत योद्धा माने जाते रहे। सत्ता के आकर्षण से दूर रहकर अपने राजनीतिक सिद्धांतों पर कायम रहना उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी।
आज जब राजनीति में दल-बदल और सत्ता के समीकरण आम हो गए हैं, ऐसे समय में सुखलाल कुशवाहा का यह संस्मरण एक अलग ही संदेश देता है—राजनीति में विचारधारा की कीमत कुर्सी से बड़ी हो सकती है।
उनका जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि राजनीतिक सफलता केवल पद पाने में नहीं, बल्कि अपने विचारों के प्रति ईमानदार बने रहने में भी होती है।
अंबेडकरवादी आंदोलन के वीर योद्धा, पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा जी को कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
जय भीम। नमो बुद्धाय।



