जब वैज्ञानिक सड़क पर हो और सत्ता मौन, तो लोकतंत्र सवालों के कटघरे में होता है

अपना विचार समाचार
नई दिल्ली। देश के जाने-माने पर्यावरणविद, शिक्षक और वैज्ञानिक की भूख हड़ताल आज नौवें दिन में पहुंच चुकी है। दिल्ली की झुलसाती गर्मी में उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है और बताया जा रहा है कि उनका वजन लगभग सात किलोग्राम कम हो चुका है। इसके बावजूद सत्ता के गलियारों में पसरा सन्नाटा कई असहज सवाल खड़े कर रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर एक वैज्ञानिक और शिक्षक को अपने ही देश के युवाओं के भविष्य की चिंता में अनशन पर बैठने की नौबत क्यों आई? यदि शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कायम होता, यदि परीक्षाओं की निष्पक्षता पर बार-बार सवाल न उठते और यदि लाखों विद्यार्थियों की पीड़ा को समय रहते सुना जाता, तो शायद यह स्थिति पैदा ही नहीं होती।
देश का युवा वर्षों की मेहनत के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता है, लेकिन जब पेपर लीक और परीक्षा संबंधी विवाद लगातार सामने आते हैं, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती—टूटता है करोड़ों युवाओं का विश्वास। सबसे दुखद यह है कि इन सवालों पर ठोस जवाब और जवाबदेही की अपेक्षा आज भी अधूरी दिखाई देती है।

जंतर-मंतर पर सैकड़ों युवा दिन-रात डटे हैं। वे किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन यदि लोकतांत्रिक विरोध भी सत्ता के कानों तक न पहुंचे, तो यह लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
सरकार के पास बहुमत हो सकता है, लेकिन बहुमत कभी भी जनता की पीड़ा के प्रति मौन रहने का लाइसेंस नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सत्ता की असली परीक्षा चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ सुनने से होती है।
यह विडंबना ही है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसने शिक्षा, पर्यावरण और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित किया, आज अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर व्यवस्था को जगाने का प्रयास कर रहा है। यदि ऐसी आवाज़ें भी अनसुनी कर दी जाएं, तो यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की उम्मीदों की उपेक्षा होगी जिनका भविष्य एक पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर है।
‘अपना विचार समाचार’ का स्पष्ट मत है कि युवाओं का भविष्य किसी सरकार, किसी दल या किसी मंत्री से छोटा नहीं हो सकता। यदि शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे प्रश्नों का समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी समाधान नहीं किया गया, तो असंतोष केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास को भी कमजोर करेगा।
इतिहास गवाह है—जब सत्ता जनता की आवाज़ सुनना बंद कर देती है, तब जनता सत्ता को सुनाना शुरू कर देती है। लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा चेतावनी संकेत होता है।



