कच्चा तेल सस्ता, पेट्रोल महंगा: राहत कब मिलेगी आम आदमी को?
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नई दिल्ली/सिंगरौली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अप्रैल के बाद लगभग 41 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन देश के करोड़ों पेट्रोल-डीजल उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया है कि सरकार अभी खुदरा ईंधन कीमतों में कटौती के पक्ष में नहीं है।
सरकार का तर्क है कि वर्तमान में उपभोक्ताओं तक वही ईंधन पहुंच रहा है, जिसके लिए पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव के दौरान अधिक कीमत पर कच्चा तेल खरीदा गया था। मंत्री के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तभी पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने पर विचार किया जाएगा।
सरकार का दावा है कि युद्ध के दौरान तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत नहीं बढ़ाए, जिससे उन्हें लगभग 75 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। अब कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट से होने वाली बचत का उपयोग पहले इसी घाटे की भरपाई में किया जा सकता है।
हालांकि, यह तर्क आम उपभोक्ताओं के लिए कई सवाल भी खड़े करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो घरेलू कीमतें अपेक्षाकृत जल्दी बढ़ जाती हैं, लेकिन कीमतें घटने पर राहत अक्सर महीनों तक टाल दी जाती है। यही कारण है कि हर बार कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद जनता को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में भारत द्वारा खरीदे गए कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 डॉलर प्रति बैरल थी, जो जून के अंत तक घटकर 83.22 डॉलर और जुलाई के शुरुआती दिनों में लगभग 67.72 डॉलर प्रति बैरल रह गई। इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में फिलहाल कोई कमी नहीं की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का असर भारतीय बाजार तक पहुंचने में लगभग दो महीने लगते हैं। ऐसे में यदि वैश्विक कीमतें स्थिर रहती हैं तो सितंबर के आसपास कुछ राहत मिलने की संभावना बन सकती है।
भारत अपनी तेल आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों का असर स्वाभाविक है, लेकिन अतीत यह भी बताता है कि जब-जब कच्चा तेल सस्ता हुआ, तब-तब करों और अन्य कारणों से उपभोक्ताओं तक उसका पूरा लाभ नहीं पहुंच पाया।



