
जी-2 मॉल के अवैध निर्माण मामले में हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, आयुक्त को 60 दिन में निर्णय के निर्देश
सिंगरौली। नगर पालिक निगम सिंगरौली द्वारा गंगोत्री-2 (जी-2) मॉल में कथित अवैध निर्माण के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर से मॉल संचालक ताराचंद्र कारीवाल को तत्काल राहत नहीं मिली है। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि संचालक निर्माण संबंधी सभी वैध दस्तावेज नगर निगम आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत करें तथा आयुक्त 60 दिनों के भीतर मामले का परीक्षण कर निर्णय लें।
जानकारी के अनुसार नगर निगम सिंगरौली ने भवन निर्माण नियमों के उल्लंघन के आरोप में जी-2 मॉल संचालक को पूर्व में अंतिम नोटिस जारी करते हुए स्वीकृत सीमा से अधिक निर्मित हिस्से को स्वयं हटाने के निर्देश दिए थे। नगर निगम आयुक्त श्रीमती सविता प्रधान के नेतृत्व में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई तेज की गई है।
स्वीकृत मानचित्र से तीन गुना अधिक निर्माण का आरोप
नगर निगम द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, मॉल के लिए 1232.92 वर्गमीटर क्षेत्र में व्यावसायिक भवन निर्माण की अनुमति प्रदान की गई थी, जबकि निरीक्षण में लगभग 3840 वर्गमीटर क्षेत्र में निर्माण पाया गया। निगम का कहना है कि यह स्वीकृत मानचित्र से लगभग तीन गुना अधिक है। म.प्र. नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 308-क में 13 मार्च 2024 को हुए संशोधन के अनुसार 10 प्रतिशत से अधिक अवैध निर्माण का शमन संभव नहीं है।
अवैध हिस्सा नहीं हटाने पर ध्वस्तीकरण की चेतावनी
निगम प्रशासन ने नोटिस में कहा था कि निर्धारित अवधि में यदि अतिरिक्त निर्माण नहीं हटाया गया तो निगम स्वयं ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा तथा इस पर आने वाला पूरा खर्च भू-राजस्व की तरह संबंधित पक्ष से वसूला जाएगा। कार्रवाई के दौरान होने वाली किसी भी क्षति के लिए संबंधित संचालक स्वयं जिम्मेदार होंगे।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद बढ़ी चर्चाएं
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद न्यायालय ने नगर निगम आयुक्त को सभी दस्तावेजों का परीक्षण कर 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अब शहर में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद जी-2 मॉल के कथित अवैध हिस्से पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई होती है या नहीं।
नगर निगम की इस कार्रवाई को शहर में अवैध निर्माण के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम निर्णय दस्तावेजों की जांच और आयुक्त के आदेश के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।



