आरक्षण भीख नहीं है, जब चाहे देना बंद कर देंगे — यह सोच संविधान और सामाजिक न्याय के विरुद्ध है- नन्द किशोर बौद्ध एडवोकेट सामाजिक कार्यकर्ता सिंगरौली मध्यप्रदेश

आरक्षण भीख नहीं है, जब चाहे देना बंद कर देंगे — यह सोच संविधान और सामाजिक न्याय के विरुद्ध है- नन्द किशोर बौद्ध एडवोकेट सामाजिक कार्यकर्ता सिंगरौली मध्यप्रदेश
आरक्षण कोई दया, कृपा या भीख नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान द्वारा दिया गया सामाजिक न्याय का एक साधन है। सदियों से जिन समुदायों को शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसरों से वंचित रखा गया, उन्हें बराबरी के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।
भारत में असमानता केवल आर्थिक नहीं रही, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक भी रही है। जाति आधारित भेदभाव ने करोड़ों लोगों को शिक्षा, संपत्ति, प्रशासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा। ऐसे में आरक्षण का उद्देश्य किसी को विशेष लाभ देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय के कारण पैदा हुई असमानता को कम करना है।
कुछ लोग यह कहते हैं कि “आरक्षण तो सरकार की मेहरबानी है, जब चाहे खत्म कर देंगे।” यह विचार गलत है। आरक्षण किसी सरकार या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। यह संविधान की भावना और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा अधिकार है। इसे खत्म करने या बदलने का निर्णय भी संविधान, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार ही हो सकता है।
आरक्षण का विरोध करने वालों को यह समझना होगा कि समान अवसर केवल कागज पर बराबरी लिख देने से नहीं आता। अगर समाज में सभी वर्गों को सदियों से समान अवसर मिले होते, तो शायद आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। जब कुछ वर्ग पीढ़ियों तक संसाधनों और संस्थानों पर अधिकार रखते रहे, तब वंचित वर्गों को आगे लाने के लिए सकारात्मक कदम जरूरी बने।
आरक्षण का उद्देश्य योग्यता को खत्म करना नहीं, बल्कि उन लोगों को अवसर देना है जिनकी प्रतिभा संसाधनों और अवसरों के अभाव में दब गई थी। शिक्षा और रोजगार में अवसर मिलने से ही समाज का संतुलित विकास संभव है।
लोकतंत्र में किसी भी नीति पर चर्चा हो सकती है, सुधार हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक न्याय के मुद्दे को केवल “भीख” कहकर खारिज करना उन करोड़ों लोगों के संघर्ष और संविधान निर्माताओं की सोच का अपमान है।
आरक्षण अधिकार और प्रतिनिधित्व का माध्यम है, किसी की कृपा नहीं।
समानता का सपना तभी पूरा होगा, जब अवसरों में भी समानता होगी।
— सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में



