क्या सरकार का विरोध करना अब अपराध है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस को दिखाया संविधान का आईना
अपना विचार समाचार |
सिंगरौली। लोकतंत्र में सरकार जनता से बनती है, जनता सरकार से नहीं। यदि सरकार की नीतियों का विरोध करने पर नागरिकों को शहर से बाहर किया जाने लगे, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि भय का शासन कहलाएगा। इसी गंभीर सवाल पर ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई को कड़ी फटकार लगाते हुए संविधान की मूल भावना को फिर से स्पष्ट किया है।
अदालत ने साफ कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। केवल विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी या असहमति के आधार पर किसी व्यक्ति को निर्वासित (Extern) नहीं किया जा सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी उन सभी एजेंसियों के लिए स्पष्ट संदेश है जो असहमति को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर दबाने का प्रयास करती हैं।
मामला (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी से जुड़ा था, जिन्हें (CAA), ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में दर्ज मामलों का हवाला देकर एक वर्ष के लिए मुंबई से बाहर करने का आदेश दिया गया था।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “क्या सभी नागरिक भारत सरकार के गुलाम हैं? क्या वे विरोध भी नहीं कर सकते?” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की निजी संस्था नहीं, बल्कि जनता की लोकसेवक है।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने माना कि शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की तरह देखना संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 की भावना के विपरीत है। अदालत ने मुंबई पुलिस और डिविजनल कमिश्नर के निर्वासन आदेश को रद्द करते हुए इसे दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करार दिया।
अपना विचार: लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान है। यदि विरोध की आवाज़ को पुलिस कार्रवाई से दबाने की कोशिश होगी, तो अदालतों को बार-बार संविधान की याद दिलानी पड़ेगी। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों की पुनर्पुष्टि है।



