सवाल पूछने वाले छात्र ‘गटर छाप’, तो लोकतंत्र का आईना कौन?

अपना विचार समाचार वेब डेस्क
लोकतंत्र में छात्रों को कभी देश का भविष्य कहा जाता है, कभी राष्ट्रनिर्माता। लेकिन जैसे ही वही युवा सड़कों पर उतरकर शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली या सरकारी नीतियों पर सवाल पूछते हैं, कुछ नेताओं की शब्दावली अचानक बदल जाती है।
भाजपा सांसद कंगना रनौत ने हालिया छात्र प्रदर्शनों में शामिल युवाओं के लिए “Generation Gutter” और “गटर छाप” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उनके इन बयानों ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।
विडंबना यह है कि जिस युवा शक्ति की बात चुनावी मंचों से बड़े गर्व के साथ की जाती है, वही युवा जब सत्ता से जवाब मांगता है तो उसके चरित्र, संस्कार और सोच पर सवाल खड़े होने लगते हैं। क्या लोकतंत्र में असहमति अब योग्यता नहीं, बल्कि अपराध का प्रमाण बनती जा रही है?
यदि कोई छात्र सरकार की प्रशंसा करे तो वह जागरूक नागरिक कहलाता है, लेकिन यदि वही छात्र सवाल पूछे, विरोध करे या जवाबदेही मांगे, तो उसके लिए अपमानजनक विशेषण तैयार मिल जाते हैं। क्या लोकतंत्र में संवाद का स्थान अब केवल प्रशंसा तक सीमित रह गया है?
लोकतंत्र की ताकत सत्ता की आलोचना सहने में होती है। सरकारें सवालों का जवाब तथ्यों से देती हैं, विशेषणों से नहीं। शब्दों की मर्यादा जितनी सत्ता से अपेक्षित है, उतनी ही विपक्ष और आंदोलनों से भी। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ही बहस की जगह कटाक्ष और अपमान को प्राथमिकता दें, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है।
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छात्रों से असहमति हो सकती है, उनके आंदोलन से भी मतभेद हो सकते हैं। लेकिन किसी पूरे वर्ग को “गटर छाप” कह देना लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध नहीं करता। लोकतंत्र में असहमति का उत्तर तर्क से दिया जाता है, तिरस्कार से नहीं। आखिर सवाल यह नहीं है कि छात्र क्या पूछ रहे हैं, बल्कि यह है कि उनके सवालों का जवाब कौन देगा।



